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Friday, May 29, 2015

पूर्ण विराम

आज ऑफिस से निकल कर जब गाड़ी में बैठा, तो अनायास ही हाथों ने गाड़ी का मुंह बीच की ओर मोड़ दिया. अरसा हुआ बीच की ओर निकले. चार साल पहले, बीच पर ही उस से मुलाक़ात हुई थी, और यहीं पर मिलने मिलाने का सिलसिला भी था. यहीं पर उसके साथ आने वाली ज़िन्दगी के सपने सजाये थे, और यहीं पर उसने कहा था कि वो इस रिश्ते को यहीं तक निभा पाएगी..... इसी बीच पर वो मुझे छोड़ कर आगे बढ़ गई थी. और मैं?
इसी बीच पर बार-बार लौटा था मैं, कभी स्तंभित, कभी भौंचक, कभी अवसाद से भरा, और कभी जड़- निर्विकार सा. कभी प्रियजनों की दया भरी दृष्टि से बचने को, कभी सब कुछ भूल कर एक समय-विहीन पल बनाने के लिए. और बाद बाद में इसी बीच पर आ कर अपना सारा गुस्सा निकाला था, उसे खो देने का, भाग्य के सामने इतना मजबूर होने का, इस एक वाकये के कारण उपजे खुद के ऊपर संदेह का गुस्सा, और, उसके इतने निर्मम तरीके से मुझे हत करने के बावजूद उसे भूल ना पाने का गुस्सा. और भी ना जाने किस-किस बात का गुस्सा.
और फिर एक दिन मैंने यहां आना बंद कर दिया पूरी तरह. वैसे ही, जैसे गम में डूबा हर व्यक्ति जीवन के उस दौर में बने हर मित्र से, जीवन के एक बार वापस पटरी पर आ जाने के बाद, कतराने लगता है. ऐसे मित्र हमारे  बारे में शायद कुछ ज़्यादा ही जान लेते हैं.
पर आज अचानक मैं यहां था, वापस इसी बीच पर. सूरज तो कब का डूब चूका था. लोग भी अब कम हो चले थे. कोप्चे वालों ने भी दुकाने आगे बढ़ा ली थीँ. अच्छा समय था. बीच तो आखिर मेरा पुराना मित्र था. और पुराने मित्र जिनसे हमारा अनौपचारिक अलगाव हो रखा हो, उनसे अकेले में मिलना ही मन भाता है, भीड़ में नही.
कुछ देर बीच पे खड़ा  मैं  पानी की लहरों को तट तक आते जाते देखता रहा. हाथों की उंगलियां जेब में पड़ी चाबियों को खनका कर चारो और फैली निस्तब्धता तोड़ रही थीं. जाने क्यों आया था यहां. आज भले ही ये लहरें मुझे मुग्ध-मोहिनी आवाज़ देकर अपने आगोश की चिरनिद्रा में नहीं बुलाती, पर इन्हे देखकर बार-बार मन पड़ जाता है कि मैं किस कदर टूटा था उसके बाद.
"हहः!!" अचानक उच्छ्वास छोड़कर मैं पलट गया..... बेकार ही आया यहाँ, बेवजह मन खट्टा और.… मैं वहीँ ठिठक गया
'कैसे बढ़ता? सालों बाद वो फिर से सामने खड़ी थी. वही सादापन, वही मोहक आँखें, वही गंभीर मुद्रा, और वही गर्वीला व्यक्तित्व। समय मानो रुक गया, और मैं? मैं तो पंगुसम खड़ा रह गया.
"तुम?", उसकी आवाज की कंपकपाहट आश्चर्य थी या सिसकी, ये कह नहीं सकता।
"हेलो, कैसी हो?" मुझे विश्वास नहीं हुआ कि ये संयत आवाज़ मेरी ही थी.
"ठीक हूँ,.... और। तुम?"
अचानक उसके जाने के बाद का हर एक पल, हर एक असह्य दुःख जो मैंने महसूस किया था, वापस दग्ध ज्वाला सा मेरे दिल को जलाते हुए मुझमे दौड़ गया. तूफानी लहरों सा, हर बीता अनुभव, वो खालीपन, वो समुद्र में डूबते जाने का अहसास, मानो अब वापस कभी उभर नहीं पाउँगा,.... वो अनंत कालापन,…
"एकदम बढ़िया, बस ऑफिस से निकला तो मन ताज़ा करने चला अाया।"
"ओह…पर… इस से पहले दिखे तो नहीं,...."
"हाँ, अब, नयी नौकरी है तो, इतना व्यस्त हो गया कि ज़्यादा हो नहीं पाता इस ओर आना."
"मैं,… मैं भी अभी कई दिनों बाद आई,… आज अचानक,… पता नहीं क्यो?"...  उसने देखा था मेरी ओर, थोड़ी देर बाद अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया,
"अच्छा लगा यूं ही मिल गयी तो. तुम क्या कर रही हो आज कल?"
हल्का सा मुस्कुरा दी थी वो, "सब वैसे का वैसा ही,…" उसकी आँखें ना जाने क्या ढूंढ रही थी मेरे चेहरे पर, मुझसे और सहा नहीं गया.
"अच्छा फिर, ध्यान रखना अपना, मैं अब निकलता हूँ…" और तेज़ क़दमों से आगे बढ़ गया मैं
"सुनो?"
"हाँ? बोलो?"
"क्या फिर कभी?.... कोई और?...." बात पूरी नहीं कर सकी थी वो
खोखली सी एक हंसी निकल गयी मुझसे "नाह… अब उन सब चोंचलो में नहीं पड़ना मुझे"
"ओह" नज़रें झुका ली उसने
"ठीक है फ़िर…"
एक पल भी और नहीं रुका मैं, सीधे गाडी की ओर बढ़ गाय. अगली बार होश सम्हाला तो अपने घर के आगे बंद गाडी में खुद को बैठा पाया, डेढ़ घंटे,… बीच से निकलने के बाद के डेढ़ घंटे ना जाने कहाँ चले गए
ट्रिन ट्रिन
मोबाइल एक मैसेज आने की सूचना दे रहा था. देखा,… उसी का मैसेज था, कांपते हांथो से जब फाइल खोली तो लिखा था:
"इतने दिनों बाद तुम्हे देखा तो महसूस किया कि चार साल पहले मैंने कितनी बड़ी भूल की,… सच कहूँ तो भूल नहीं पायी कभी तुम्हे,… लगता रहा कि मानों कुछ अधूरा सा है जीवन में, पर आज तुम्हे देख कर लगा कि तुम शायद बहुत आगे बढ़ गए. कितनी सहजता से मिले तुम, और मैं? मैं तो बिखर गयी फिर से. आज लगता है कि तुम्हे वापस आने कहूं. क्या आज मैं तुम्हे वापस बुलाऊँ तो तुम आओगे? जवाब के इंतज़ार में,"
क्या कहता मैं? क्या अब एक हो सकेंगे हम? क्या उस निर्मम से फिर दिल लगाने का दुस्साहस कर पाउँगा कभी? क्या ऐसा करना भी चाहता हूँ मैं? और कर भी लिया तो का उसी प्रेम और उसी समर्पण से उसको निभा पाउँगा मैं?
नहीं,
अब कभी नहीं
मैंने मैसेज मिटा कर मोबाइल दोबारा जेब में सरका लिया, एक गहरी सांस होठों के बीच से निकल गयी
आज उस से जुडी घटनाओं का क्रम पूरा हुआ
अब मैं आज़ाद हूँ

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