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Saturday, April 7, 2012

अनर्गल

बारिश की बूँदें, माटी की खुशबू और नीला गगन
मीठी सी फिर चलने लगी कैसी ये पवन?
सपने नए बुन ने लगा आज फिर मेरा मन

नीला गगन, चंचल पवन, झूमे मेरा मन

कोंपल फटी, कलियाँ खिली, धरती फिर हंसी
फूलों के रस में भीगी हुई है भौरों की ख़ुशी
अच्छी लगे चेहरे पे पड़ती सूरज की तपन

धरती सुनहरी सजी पा के अपने सूरज की तपन

तितली उड़े थोड़ी बावरी थोरी मतवारी सी
कोयल की कुहुक कभी मीठी सी कभी प्यारी सी
पी को पुकारे बाट निहारे वो हो के मगन

कोयल हुई बावरी कुहुके, ढूंढें बस अपना सजन 

मिले जो सजन, मिट जाए तपन, हो कर के मगन, झूमे उसका मन.


1 comment:

Nihar Ranjan said...

अति सुन्दर.