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Saturday, September 27, 2008

तरंगें

तरंगें गहरे पानी में उठती है उफन कर कभी कभी
फ़िर एक हवा के झोंके में नश्वर लीला मिट जाती है
उजले दिन की रंगत सारी खोती है सागर के तल में
काली सी एक परछाई में यूँ ही गुप चुप मर जाती है

एकांत रात की बाहों में पानी की बूंदों की लहरी
उठती है मन के क्रंदन सी आंसू की याद दिलाती है
गहरे पानी की चादर में लिपटी है रेशम की नरमी
गीली गीली उन् परतो में खामोशी दबी बुलाती है

लहरों के बढ़ते साए भी दिखते है hअजारों आंखों से
चंदा की ज्योत बिखर कर जब आँखें निष्प्राण जलाती है
साँसे लेता है पानी भी देखा करता है आंखों से
चलता है लहरों के ज़रिये बातें करता बूंदों ज़रिये

ये रूप बदलता रहता है लहरों लहरों पे छलता है
चंदा को नचा कर उंगली पर कितनी ही बार निगलता है
पानी के काले दर्पण में दिखती काली हर परछाई
विस्मित करती कौतुक भर के संगीत भरी स्वर शहनाई

पानी की भाषा अनजानी पानी की भाषा सब जाने
पानी की मध्धम लहरी में बनते कितने ही अफ़साने
उच्छ्वास छोड़ कर ये पानी धीमे से स्वर में कहता है
जीवन को क्यो परिभाषा दो? जीवन तरंग में रहता है

2 comments:

avi said...

main ek kalam ka sipahi hun aur recently main bhi kuch likhne ki soch raha tha ki is community se aapka "jal tarango" per likha kavita padha 3 se 4 bar aur mujhe mera visay mil gaya thanks for...

Ramesh said...

Good one Paridhi Ji

Keep it up !